Friday, December 26, 2008

Anjana

बादशाहों की मुअत्तर ख्वाबगाहों में कहाँ
वह मज़ा जो भीगी-भीगी घास पर सोने में है,
मुत्मईन बेफिक्र लोगों की हँसी में भी कहाँ
लुत्फ़ जो एक दूसरे को देख कर रोने में है!

मकतबे इश्क में इक ढंग निराला देखा
उसको छुट्टी न मिली जिसको याद हुआ!

कौन ये ले रहा है अंगडाई
आसमानो को भी नींद आती है


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